छत्रपति शिवाजी महाराज | The History of Chhatrapati Shivaji Maharaj.

छत्रपति शिवाजी महाराज | The History of Chhatrapati Shivaji Maharaj.

छत्रपति शिवाजी महाराजछत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन परिचय (Biography of Chhatrapati Shivaji Maharaj

छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज : परिचय (Introduction)

श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज भारत ( India ) के गौरव ( Pride ) है । उनका नाम स्वर्णिम अक्षरो ( golden words ) में भारत के इतिहास में दर्ज  है । भारत का बच्चा बच्चा उन पर गर्व करता है । उनका पूरा नाम छत्रपति शिवाजी भोसले है … भारत में बहुत से लोग उनको  हिंदू हृदय सम्राट भी कहते है   । शिवाजी महाराज का जन्म 16 फरवरी सन 1630 को पुणे के पास स्थित  शिवनेरी दुर्ग के  मराठी परिबार  में हुआ था । उनके पिता शाह जी भोंषले एक शक्तिशाली सामंत थे ।

उनकी माता जीजाबाई जाधव कुल में उत्पन्न असाधारण प्रतिभाशाली महिला थी । शिवाजी के बड़े भाई का नाम सम्भाजी था जो अधिकतर समय अपने पिता शाहजी भोसलें के साथ ही रहते थे । शाहजी राजे कि दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते थीं । उनसे एक पुत्र हुआ जिसका नाम एकोजी राजे था । छत्रपति शिवाजी भोसले भारत के एक महान राजा एवं रणनीतिकार थे । जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत  में मराठा साम्राज्य  की नींव रखी । इसके लिए उन्होंने मुग़ल साम्राज्य  के शासक औरंगजेब  से संघर्ष किया । सन् 1674 में रायगढ़  में उनका राज्याभिषेक हुआ और वह ” छत्रपति “ बने ।

छत्रपती शिवाजी महाराज ने अपनी अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों कि सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया । उन्होंने समर – विधा  में अनेक नवाचार  किए तथा छापामार युद्ध  ( guerilla warfare ) की नयी शैली ( शिवसूत्र ) विकसित की । उन्होंने प्राचीन हिन्दू  राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और मराठी एवं संस्कृत   को राजकाज की भाषा बनाया । वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम में नायक के रूप में स्मरण किए जाने लगे । बाल गंगाधर तिलक  ने राष्ट्रीयता की भावना के विकास के लिए शिवाजी जन्मोत्सव की शुरुआत की ।

आइये छत्रपति शिवाजी महाराज के गौरवशाली जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओ एवं उपलब्धियों के बारे में बिस्तार से जाने ।

छत्रपति शिवाजी महाराज का वैवाहिक जीवन ( Marital life of shivaji maharaj ) 

शिवाजी का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निंबाळकर के साथ लाल महल, पुणे में हुआ था । उन्होंने कुल 8 विवाह किए थे । वैवाहिक राजनीति के जरिए उन्होंने सभी मराठा सरदारों को एक छत्र के नीचे लाने में सफलता प्राप्त की । शिवाजी की पत्नियाँ :

सईबाई निम्बालकर – (बच्चे: संभाजी, 

सखुबाई राणूबाई ( अम्बिकाबाई ); सोयराबाई मोहिते – ( बच्चे – दीपबै , राजाराम ) ; पुतळाबाई पालकर ( 1653 – 1680 ) , गुणवन्ताबाई इंगले ; सगुणाबाई शिर्के , काशीबाई जाधव , लक्ष्मीबाई विचारे , सकवारबाई गायकवाड़ – ( कमलाबाई ) ( 1656-1680 ) ।

दुर्गों पर नियंत्रण (Fortification control)

रोहिदेश्वर का दुर्ग ( Rohideshwar fort ) सबसे पहला दुर्ग ( किला ) था । जिसके छत्रपति शिवाजी महाराज ने सबसे पहले अधिकार किया था । उसके बाद तोरणा का दुर्ग ( Torna Fortress ) जोपुणे के दक्षिण पश्चिम में 30 किलोमीटर की दूरी पर था। शिवाजी ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना दूत   भेजकर खबर भिजवाई की वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौंप दिया जाये । उन्होंने आदिलशाह के दरबारियों को पहले ही रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया था और अपने दरबारियों की सलाह के मुताबिक आदिलशाह ने शिवाजी महाराज को उस दुर्ग का अधिपति बना दिया । उस दुर्ग में मिली सम्पत्ति से शिवाजी महाराज ने दुर्ग की सुरक्षात्मक कमियों की मरम्मत का काम करवाया । इससे कोई 10 किलोमीटर दूर राजगढ़ का दुर्ग था और शिवाजी महाराज ने इस दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया । शिवाजी महाराज की इस साम्राज्य विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली तो वह क्षुब्ध ( angry ) हुआ । उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियन्त्रण में रखने को कहा ।

शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया और नियमित लगान बन्द कर दिया । राजगढ़ के बाद उन्होंने चाकन के दुर्ग पर अधिकार कर लिया और उसके बाद कोंडना के दुर्ग पर अधिकार किया । परेशान होकर सबसे काबिल मिर्जाराजा जयसिंह को भेजकर शिवाजी के 23 किलों पर कब्जा किया । उसने पुरंदर के किले को नष्ट कर दिया । शिवाजी को इस संधि कि शर्तो को मानते हुए अपने पुत्र संभाजी को मिर्जाराजा जयसिंह को सौपना पड़ा । बाद में शिवाजी महाराज के मावला तानाजी मालुसरे ने कोंढाणा दुर्ग पर कब्जा किया पर उस युद्ध में वह विरगती को प्राप्त हुआ उसकी याद में कोंडना पर अधिकार करने के बाद उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया ।

शाहजी राजे को पुणे और सूपा की जागीरदारी दी गई थी और सूपा का दुर्ग उनके सम्बंधी बाजी मोहिते के हाथ में थी । शिवाजी महाराज ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया । उसकी सेना का कुछ भाग भी शिवाजी महाराज की सेवा में आ गया । इसी समय पुरन्दर के किलेदार की मृत्यु हो गई और किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई । दो भाइयों के निमंत्रण पर शिवाजी महाराज पुरन्दर पहुंचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइयों को बन्दी बना लिया । इ स तरह पुरन्दर के किले पर भी उनका अधिकार स्थापित हो गया । 1647 ईस्वी तक वे चाकन से लेकर नीरा तक के भूभाग के भी अधिपति बन चुके थे । अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ शिवाजी महाराज ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई ।

एक अश्वारोही सेना ( cavalry ) का गठन कर शिवाजी महाराज ने आबाजी सोन्देर के नेतृत्व में कोंकण  के विरुद्ध एक सेना भेजी । आबाजी ने कोंकण  सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया । इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी शिवाजी महाराज के अधीन आ गए थे । लूट की सारी सम्पत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई । कल्याण के गवर्नर को मुक्त कर शिवाजी महाराज ने कोलाबा की ओर रुख किया और यहाँ के प्रमुखों को विदेशियों के ख़िलाफ़़ युद्ध के लिए उकसाया ।

मुगलों से पहली मुठभेड़ (First encounter with Mughals)

शिवाजी के बीजापुर तथा मुगल दोनों शत्रु थे । उस समय शहज़ादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था । इसी समय 1 नवम्बर 1656 को बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की मृत्यु हो गई जिसके बाद बीजापुर में अराजकता का माहौल पैदा हो गया । इस स्थिति का लाभ उठाकर औरंगज़ेब ने बीजापुर पर आक्रमण कर दिया और शिवाजी ने औरंगज़ेब का साथ देने की बजाय उसपर धावा बोल दिया । उनकी सेना ने जुन्नार नगर पर आक्रमण कर ढेर सारी सम्पत्ति के साथ 200 घोड़े लूट लिये । अहमदनगर ( Ahmednagar ) से 700 घोड़े , चार हाथी के अलावा उन्होंने गुण्डा तथा रेसिन के दुर्ग पर भी लूटपाट मचाई । इसके परिणामस्वरूप औरंगजेब शिवाजी से खफ़ा हो गया और मैत्री वार्ता समाप्त हो गई । शाहजहां के आदेश पर औरंगजेब ने बीजापुर के साथ सन्धि कर ली और इसी समय शाहजहां बीमार पड़ गया । उसके व्याधिग्रस्त होते ही औरंगज़ेब उत्तर भारत चला गया और वहां शाहजहां को कैद करने के बाद मुगल साम्राज्य का शाह बन गया ।

कोंकण पर अधिकार (Right to konkan )

दक्षिण भारत में औरंगजेब की अनुपस्थिति और बीजापुर की डवाँडोल राजनीतिक स्थित को जानकर शिवाजी ने समरजी को जंजीरा पर आक्रमण करने को कहा । पर जंजीरा के सिद्दियों के साथ उनकी लड़ाई कई दिनों तक चली । इसके बाद शिवाजी ने खुद जंजीरा पर आक्रमण किया और दक्षिण कोंकण  पर अधिकार कर लिया और दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर एकत्र किया । कल्याण तथा भिवण्डी पर अधिकार करने के बाद वहां नौसैनिक अड्डा बना लिया । इस समय तक शिवाजी 4 0 दुर्गों के मालिक बन चुके थे ।

बीजापुर से संघर्ष (struggle with bijapur)

इधर औरंगजेब के आगरा ( उत्तर की ओर ) लौट जाने के बाद बीजापुर के सुल्तान ने भी राहत की सांस ली । अब शिवाजी ही बीजापुर के सबसे प्रबल शत्रु रह गए थे । शाहजी को पहले ही अपने पुत्र को नियन्त्रण में रखने को कहा गया था पर शाहजी ने इसमें अपनी असमर्थता जाहिर की । शिवाजी से निपटने के लिए बीजापुर के सुल्तान ने अब्दुल्लाह भटारी ( अफ़ज़ल खां ) को शिवाजी के विरूद्ध भेजा ।

अफ़जल ने 120000 सैनिकों के साथ 1659 में कूच किया । तुलजापुर के मन्दिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई , शिरवल के नजदीक तक आ गया । पर शिवाजी प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे । अफजल खां ने अपने दूत कृष्णजी भास्कर को सन्धि – वार्ता के लिए भेजा । उसने उसके मार्फत ये सन्देश भिजवाया कि अगर शिवाजी बीजापुर की अधीनता स्वीकार कर ले तो सुल्तान उसे उन सभी क्षेत्रों का अधिकार दे देंगे जो शिवाजी के नियन्त्रण में हैं । साथ ही शिवाजी को बीजापुर के दरबार में एक सम्मानित पद प्राप्त होगा ।

हालांकि शिवाजी के मंत्री और सलाहकार अस सन्धि के पक्ष में थे पर शिवाजी को ये वार्ता रास नहीं आई । उन्होंने कृष्णजी भास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनाथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खां के पास भेजा । गोपीनाथ और कृष्णजी भास्कर से शिवाजी को ऐसा लगा कि सन्धि का षडयन्त्र रचकर अफजल खां शिवाजी को बन्दी बनाना चाहता है ।

अतः उन्होंने युद्ध के बदले अफजल खां को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खां को सन्धि वार्ता के लिए राजी किया । सन्धि स्थल पर दोनों ने अपने सैनिक घात लगाकर रखे थे मिलने के स्थान पर जब दोनों मिले तब अफजल खां ने अपने कट्यार से शिवाजी पे वार किया बचाव में शिवाजी ने अफजल खां को अपने वस्त्रों वाघनखो से मार दिया ( 10 नवम्बर 1659 ) ।

अफजल खां की मृत्यु के बाद शिवाजी ने पन्हाला के दुर्ग पर अधिकार कर लिया । इसके बाद पवनगढ़ और वसंतगढ़ के दुर्गों पर अधिकार करने के साथ ही साथ उन्होंने रूस्तम खां के आक्रमण को विफल भी किया । इससे राजापुर तथा दावुल पर भी उनका कब्जा हो गया । अब बीजापुर में आतंक का माहौल पैदा हो गया और वहां के सामन्तों ने आपसी मतभेद भुलाकर शिवाजी पर आक्रमण करने का निश्चय किया ।

2 अक्टूबर 1665 को बीजापुरी सेना ने पन्हाला दुर्ग पर अधिकार कर लिया । शिवाजी संकट में फंस चुके थे पर रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे । बीजापुर के सुल्तान ने स्वयं कमान सम्हालकर पन्हाला , पवनगढ़ पर अपना अधिकार वापस ले लिया , राजापुर को लूट लिया और श्रृंगारगढ़ के प्रधान को मार डाला । इसी समय कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के साथ समझौता कर लिया ।

इस सन्धि में शिवाजी के पिता शाहजी ने मध्यस्थता का काम किया । सन् 1662 में हुई इस सन्धि के अनुसार शिवाजी को बीजापुर के सुल्तान द्वारा स्वतंत्र शासक की मान्यता मिली । इसी सन्धि के अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोण्डा तक ( 250 किलोमीटर ) का और पूर्व में इन्दापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक ( 150 किलोमीटर ) का भूभाग शिवाजी के नियन्त्रण में आ गया । शिवाजी की सेना में इस समय तक 30000 पैदल और 1000 घुड़सवार हो गए थे ।

मित्रों हम भाग्यशाली है जो हम भारत में जन्में … क्यों की यह वीरों की भूमि है .. छत्रपति शिवाजी महाराज ही नहीं यहां और भी कई महान हस्तियों ने जन्म लिया है .. जानिये उन के विषय में संछेप में ..

सरदार भगत सिंह
स्वामी विवेकानंद

छत्रपति शिवाजी महाराज का आगरा में आमंत्रण और पलायन (Invitation and escape of Shivaji Maharaj to Agra)

शिवाजी को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है । इसके विरोध में उन्होंने अपना रोश भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया । औरंगजेब इससे क्षुब्ध ( angry ) हुआ और उसने शिवाजी को नजरबन्द कर दिया और उनपर 5000 सैनिकों के पहरे लगा दिये । कुछ ही दिनों बाद ( 18 अगस्त 1666 को ) राजा शिवाजी को मार डालने का इरादा औरंगजेब का था । लेकिन अपने अदम्य साहस ओर युक्ति के साथ शिवाजी और सम्भाजी दोनों इससे भागने में सफल रहे 17 अगस्त 1666 । सम्भाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़ शिवाजी महाराज बनारस , गये , पुरी  होते हुए सकुशल राजगढ़ पहुँच गए [ 2 सितम्बर 1666] । इससे मराठों को नवजीवन सा मिल गया । औरंगजेब ने जयसिंह पर शक करके उसकी हत्या विष देकर करवा डाली । जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद सन् 1668 में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार सन्धि की । औरंगजेब ने शिवाजी को राजा की मान्यता दी । शिवाजी के पुत्र शम्भाजी को 5000 की मनसबदारी मिली और शिवाजी को पूना , चाकन और सूपा का जिला लौटा दिया गया । पर , सिंहगढ़ और पुरन्दर पर मुग़लों का अधिपत्य बना रहा । सन् 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लूटा । नगर से 132 लाख की सम्पत्ति शिवाजी के हाथ लगी और लौटते वक्त उन्होंने मुगल सेना को सूरत के पास फिर से हराया ।

औरंगजेब के विषय में और विस्तृत जानकारी हेतु आप निम्नलिखित पोस्ट पढ़ सकते है ..
औरंगजेब जीवन परिचय इतिहास

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक (Coronation of Shivaji Maharaj)

सन् 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरन्दर की सन्धि के अन्तर्गत उन्हें मुग़लों को देने पड़े थे। पश्चिमी महाराष्ट्र में स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के बाद शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा, परन्तु मुस्लिम सैनिको ने ब्राहमणों को धमकी दी कि जो भी शिवाजी का राज्याभिषेक करेगा उनकी हत्या कर दी जायेगी. जब ये बात शिवाजी तक पहुंची की मुगल सरदार ऐसे धमकी दे रहे है तब शिवाजी ने इसे एक चुनौती के रुप मे लिया और कहा की अब वो उस राज्य के ब्राह्मण से ही अभिषेक करवायेंगे जो मुगलों के अधिकार में है

शिवाजी के निजी सचिव बालाजी जी ने काशी में तीन दूतो को भेजा, क्युंकि काशी मुगल साम्राज्य के अधीन था. जब दूतों ने संदेश दिया तो काशी के ब्राह्मण काफी प्रसन्न हुये. किंतु मुगल सैनिको को यह बात पता चल गई तब उन ब्राह्मणों को पकड लिया. परंतु युक्ति पूर्वक उन ब्राह्मणों ने मुगल सैंनिको के समक्ष उन दूतों से कहा कि शिवाजी कौन है हम नहीं जानते है. वे किस वंश से हैं ? दूतों को पता नहीं था इसलिये उन्होंने कहा हमें पता नहीं है. तब मुगल सैनिको के सरदार के समक्ष उन ब्राह्मणों ने कहा कि हमें कहीं अन्यत्र जाना है, शिवाजी किस वंश से हैं आपने नहीं बताया अत: ऐसे में हम उनके राज्याभिषेक कैसे कर सकते हैं. हम तो तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं और काशी का कोई अन्य ब्राह्मण भी राज्याभिषेक नहीं करेगा जब तक राजा का पूर्ण परिचय न हो अत: आप वापस जा सकते हैं. मुगल सरदार ने खुश होके ब्राह्मणो को छोड दिया और दूतो को पकड कर औरंगजेब के पास दिल्ली भेजने की सोची पर वो भी चुप के से निकल भागे.

वापस लौट कर उन्होने ये बात बालाजी आव तथा शिवाजी को बताई. परंतु आश्चर्यजनक रूप से दो दिन बाद वही ब्राह्मण अपने शिष्यों के साथ रायगढ पहुचें ओर शिवाजी का राज्याभिषेक किया। इसके बाद मुगलों ने फूट डालने की कोशिश की और शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद भी पुणे के ब्राह्मणों को धमकी दी कहा कि शिवाजी को राजा मानने से मना करो. ताकि प्रजा भी इसे न माने !! लेकिन उनकी नहीं चली. शिवाजी ने अष्टप्रधान मंडल की स्थापना की. विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी इस समारोह में आमंत्रित किया गया। पर उनके राज्याभिषेक के 12 दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था इस कारण से 4 अक्टूबर 1674 को दूसरी बार शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि ग्रहण की। दो बार हुए इस समारोह में लगभग 50 लाख रुपये खर्च हुए। इस समारोह में हिन्दवी स्वराज की स्थापना का उद्घोष किया गया था। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरुद्ध भेजा पर वे असफल रहे |

छत्रपति शिवाजी महाराज की कुशल धार्मिक नीति (Shivaji’s efficient religious policy)

शिवाजी एक धर्मपरायण हिन्दु शासक थे तथा वह धार्मिक सहिष्णु भी थे। उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता थी। कई मस्जिदों के निर्माण के लिए शिवाजी ने अनुदान दिया। हिन्दु पण्डितों की तरह मुसलमान सन्तों और फ़कीरों को भी सम्मान प्राप्त था। उनकी सेना में मुसलमान सैनिक भी थे। शिवाजी हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देते थे। पारम्परिक हिन्दू  मूल्यों तथा शिक्षा पर बल दिया जाता था। अपने अभियानों का आरम्भ वे प्रायः दशहरा के अवसर पर करते थे।

चरित्र

शिवाजी महाराज को अपने पिता से स्वराज की शिक्षा ही मिली जब बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी राजे को बन्दी बना लिया तो एक आदर्श पुत्र की तरह उन्होंने बीजापुर के शाह से सन्धि कर शाहजी राजे को छुड़वा लिया। इससे उनके चरित्र में एक उदार अवयव ऩजर आता है। उसेक बाद उन्होंने पिता की हत्या नहीं करवाई जैसा कि अन्य सम्राट किया करते थे। शाहजी राजे के मरने के बाद ही उन्होंने अपना राज्याभिषेक करवाया हालांकि वो उस समय तक अपने पिता से स्वतंत्र होकर एक बड़े साम्राज्य के अधिपति हो गये थे। उनके नेतृत्व को सब लोग स्वीकार करते थे यही कारण है कि उनके शासनकाल में कोई आन्तरिक विद्रोह जैसी प्रमुख घटना नहीं हुई थी।

वह एक अच्छे सेनानायक के साथ एक अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। कई जगहों पर उन्होंने सीधे युद्ध लड़ने की बजाय कूटनीति से काम लिया था। लेकिन यही उनकी कूटनीति थी, जो हर बार बड़े से बड़े शत्रु को मात देने में उनका साथ देती रही।

दक्षिण में विजय (victory in the south)

सन् 1677 – 78 में छत्रपति शिवाजी महाराज का ध्यान कर्नाटक की ओर गया । बम्बई के दक्षिण में कोंकण , तुंगभद्रा नदी के पश्चिम में बेळगांव तथा धारवाड़ का क्षेत्र , मैसूर , वैलारी , त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार करने के बाद April 3 , 1680 को शिवाजी का देहान्त हो गया ।

छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु और उनके उत्तराधिकारी (Death of Shivaji and his successors)

विष दिलाने के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु 3 अप्रैल 1680 में हुई। उस समय शिवाजी के उत्तराधिकार संभाजी को मिले। शिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र संभाजी थे और दूसरी पत्नी से राजाराम नाम एक दूसरा पुत्र था। उस समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी अतः मराठों ने शम्भाजी को राजा मान लिया। उस समय औरंगजेब राजा शिवाजी का देहान्त देखकर अपनी पूरे भारत पर राज्य करने कि अभिलाषा से अपनी 5,00,000 सेना सागर लेकर दक्षिण भारत जीतने निकला। औरंगजेब ने दक्षिण में आते ही अदिल्शाही 2 दिनो में और कुतुबशाही 1 ही दिनो में खतम कर दी। पर राजा सम्भाजी के नेतृत्व में मराठाओ ने 1 साल युद्ध करते हुये अपनी स्वतन्त्रता बरकरा‍र रखी। औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया। संभाजी ने उसको अपने यहाँ शरण दी। औरंगजेब ने अब फिर जोरदार तरीके से संभाजी के ख़िलाफ़ आक्रमण करना शुरु किया। उसने अन्ततः 1689 में संभाजी के बीवी के सगे भाई याने गणोजी शिर्के की मुखबरी से संभाजी को मुकरव खाँ द्वारा बन्दी बना लिया। औरंगजेब ने राजा संभाजी से बदसलूकी की और बुरा हाल कर के मार दिया। अपनी राजा कि औरंगजेब द्वारा की गई बदसलूूूकी और नृृृृृृशंसता द्वारा मारा हुआ देखकर पूरा मराठा स्वराज्य क्रोधित हुआ। उन्होने अपनी पुरी ताकत से राजाराम के नेतृत्व में मुगलों से संघर्ष जारी रखा। 1700 इस्वी में राजाराम की मृत्यु हो गई। उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका बनकर राज करती रही। आखिरकार 25 साल मराठा स्वराज्य के युद्ध लड के थके हुये औरंगजेब की उसी छ्त्रपती शिवाजी के स्वराज्य में दफन हुये।

निष्कर्ष (Conclusion)

दोस्तों इस आर्टिकल में आपने विस्तार से  जाना  छत्रपति शिवाजी महाराज का परिचय (Introduction),

छत्रपति शिवाजी महाराज का वैवाहिक जीवन ( Marital life of shivaji maharaj ) ,

दुर्गों पर नियंत्रण ( Fortification control ) , मुगलों से पहली मुठभेड़ ( First encounter with Mughals ) , कोंकण पर अधिकार ( Right to konkan ) , बीजापुर से संघर्ष ( struggle with bijapur ) , शिवाजी  महाराज का आगरा में आमंत्रण और पलायन ( Invitation and escape of Shivaji Maharaj to Agra ) , छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक ( Coronation of Shivaji Maharaj ) , शिवाजी की कुशल धार्मिक नीति (Shivaji’s efficient religious policy) , दक्षिण में विजय (victory in the south),शिवाजी की मृत्यु और उनके उत्तराधिकारी ( Death of Shivaji and his successors ) , उम्मीद करता हु जानकारी आपको पसंद आयी होगी यदि आपको कोई शिकायत या सुझाव हो तो कमेंट बॉक्स में अवश्य बताये . |

Written by
Prateek
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