मुंशी प्रेमचंद ..

मुंशी प्रेमचंद ..

मुंशी प्रेमचंदमुंशी प्रेमचंद

दोस्तों .. स्कूल  की  किताबों  में  अक्सर  आप  सब  एक  नाम   सुना  और  पढ़ा  होगा । एक  ऐसा  नाम  जिसकी  रचनाओं  में  भारतीय  संस्कृति , भेद  रहित  समाज , जागृति  आदि  जैसे  कई  महत्वपूर्ण  बिंदु  विद्यमान  होते  थे  । एक  ऐसा  लेखक  जिसनें  कृषकों  के  किरदारों  को  अपनी  रचनाओं  में  महत्वपूर्ण  बनाया । और   ”गोदान”  तथा  ”वरदान”  जैसे  उपन्यासों  में  उनकी  दशा  का  चित्रण  किया । उनके  परिवार  के  सदस्यों  ने  उन्हें  धनपतराय  और  नवाबराय  जैसे  नाम  दिए  ।  किन्तु  उन्होंने  ख्याति  पायी  ” मुंशी  प्रेमचंद ” के  नाम  से  ।

जी  हां  !  मुंशी प्रेमचंद .. जिनकी लेखन शैली , रचनाये और उनका जीवन इतना विराट है की एक पोस्ट में उसका वर्णन मेरे लिए असंभव है .. लेकिन प्रयास करूँगा की कुछ महत्वपूर्ण बातों पर प्रकाश डाल सकूँ

मुंशी  अजायबलाल  श्रीवास्तव  और  आनंदी देवी के  यहां  31 जुलाई  सन 1880  को वाराणसी  के  लमही  गांव  में  एक  बालक  का जन्म  हुआ , जिन्हें  हम  ‘ मुंशी प्रेमचंद ‘ के  नाम  से  जानते  हैं  । इनका  प्रारंभिक  जीवन  काफी  संघर्षों  से  घिरा  रहा । इनकी  माता  का देहांत  इनकी  बाल्यावस्था  में  ही  हो  गया  था । उस  वक़्त ये उर्दू  और  फारसी  की शिक्षा  प्राप्त  कर  रहे  थे । इनके  पिता  ने  कुछ  ही  समय  बाद ( अनुमानतः 2 वर्ष पश्चात ) दूसरा  विवाह  कर  लिया  था  ।  स्वयं  इनका  विवाह  15  वर्ष  की  आयु  में  ही  हो  गया  था । 1919  में  मुंशी  प्रेमचंद  ने  कला  संकाय  में  स्नातक  ( BA )  की  परीक्षा  पास  कर  ली  थी  । और  20  वर्ष  की  आयु  में  बतौर  अध्यापक  इन्होंने  नौकरी  प्रारंभ  कर  दी  थी  , तनख्वाह  थी  20  रुपये  मासिक ।

 मुंशी  प्रेमचंद  ने अपना  लेखनकार्य  उर्दू  भाषा  से  शुरू  किया  था ।

प्रेमचंद और सोजेवतन

सोजेवतन ‘  इनका  पहला  कहानी  संग्रह  था जो  उर्दू  में था । और  1908  को  प्रकाशित  हुआ  था ।  ‘ सोजेवतन ‘  अर्थात ‘ देश  का  मातम ‘  मुंशी  प्रेमचंद  के  इस  पहले  उर्दू  कहानी  संग्रह  की  भी  अपनी  एक  कहानी  है , अगर  ये  संग्रह  ना  प्रकाशित  हुआ  होता  तो  हम  मुंशी  प्रेमचंद  को ‘ नवाबराय ‘ के  नाम  से  पहचानते । दरअसल  ‘ सोजेवतन ‘ के  प्रकाशन  के  बाद  अंग्रेजी  हुकूमत  के  एक  अफसर  जो  हमीरपुर  के  कलेक्टर  के  पद  पर  था ,  ने  नवाबराय  को  बुलवाया । कलेक्टर  के  सामने  जब  वे  उपस्थित  हुए  तो  उनके  पास  ही  उनके  कहानी  संग्रह  की  प्रति  भी  रखी  हुई  थी ।  थोड़ी  बातचीत  के  बाद  कलेक्टर  ने  उन्हें  डांटते  हुए  कहा  की  उनकी  कहानियों  में  देशद्रोह  की  भावना  झलकती  है  ।  और  इसकी  जितनी  भी  प्रतियां  उनके  पास  है  वे  उन्हें  तुरंत  सौंप  दे  ।  नवाबराय  द्वारा  आदेश  का  पालन  हुआ ,  और  कलेक्टर  ने  वे  सारी  प्रतियां  उनके  सामने  ही  जला  डाली । भविष्य  में  नवाबराय  अपना  लेखन  जारी  रख  सकें  और  फिर  से  उन्हें  किसी  के  कोपभाजन  का  शिकार  ना  होना  पड़े  ।  इसलिए  उन्होंने  अपना  नाम  नवाबराय  से  बदलकर  प्रेमचंद  कर  लिया  ।  अब  ये  हमारे  मुंशी  प्रेमचंद  जी  की  साहित्यिक  प्रतिभा  ही  थी  जो  वे  अपने  नकली  नाम  से  ज्यादा  प्रसिद्ध  हुए  । उन्हें  यह  नाम  ‘ प्रेमचंद ‘ उनके  मित्र  और  एक  उर्दू  पत्रिका  ‘ ज़माना ‘ के  संपादक  मुंशी  दयानारायण  निगम  ने  सुझाया  था ।

नवाबराय से प्रेमचंद

नवाबराय ने   इस  नाम   को  स्वीकार   तो  किया  लेकिन   उन्हें  यह  अफसोस  तो  था  कि   जो  मेहनत  उन्होंने  ‘ नवाबराय ‘ को  पहचान  देने   के   लिए  अब  तक  कि  वह  व्यर्थ  हो   जाएगी  । हालांकि  प्रेमचंद  के  रूप  में  वे  साहित्य  के  आकाश  के  ‘ ध्रुव तारा ‘ बन  गए  । अपने  छद्म नाम  ‘ प्रेमचंद ‘  के  साथ  उनकी  शुरुआती  रचनायें  जैसे –  बड़े  घर  की  बेटी , दुनिया   का  सबसे  अनमोल रतन  , 1910  में  ‘ जमाना ‘  में  ही  प्रकाशित  हुई  थी  ।

उन्होंने  अपनी  कृतियों  में  किसान ,  दलित   एवम  स्त्रियों  की  समस्याएं  एवम  संघर्षो  को  जीवंत  किया  है  ।  मुंशी  प्रेमचंद  जी  ने  सवा सेर गेंहू , ठाकुर  का  कुंवा , बांका  जमींदार  आदि  कहानियों  में  दलित  पीड़ा  को  दिखाया  है । और  ‘ रंगभूमि ‘ में  नायक  ‘सूरदास’ को  सदा  के लिए  अमर  कर   दिया । अपनी  40  से ज्यादा  कहानियों  में  वे  किसान   की  बातें  करते  हैं  । प्रेमाश्रम , गोदान , वरदान आदि  में  वे  किसान  की  दुर्दशा  और  संघर्ष का  हृदय स्पर्शी  चित्रण  करते   हैं  ।  मुंशी प्रेमचंद  ऊर्दू  , फ़ारसी , हिंदी  तथा  अंग्रेजी  भाषा  के   जानकार  थे ।

प्रेमचंद और हंस

उपन्यास , कहानी  तथा  नाटक  के   रचियता  होने   के   साथ – साथ  उन्होंने  ‘ हंस ‘ पत्रिका  का  संपादन भी   किया  था   । तथा  साथ  ही  उन्होंने   एक  साप्ताहिक  पत्र  ‘ जागरण ‘  भी   निकाला ‘ हंस ‘  के  विषय  में  एक  बात  और  है   जो  पाठको  के  जानने  योग्य   है   । प्रेमचंद  इस  पत्रिका  से  बेहद  स्नेह  करते  थे । अपनी  बीमारी  और   कुछ   अन्य  कारणों  से  उन्हें  इस   पत्रिका  के   संपादक  के  रूप से  इस्तीफा   देना  पड़ा ।  किन्तु  कुछ  समय   बाद  समीकरण  ऐसे  बदले  की  फिर  उन्हें   फिर  इससे   जुड़ने  का  मौका  मिला  । लेकिन  ये  दुर्भाग्य   था  की   उनका  और   ‘ हंस ‘   का  सफर  ज्यादा  लंबा  नही  रहा  , उनकी  अस्वस्थता  इतनी  बढ़  चुकी  थी  कि  वे  हंस  के  संपादन   की  दूसरी  पारी  में  इसका  सिर्फ   एक   ही  अंक  निकाल   पाये । और  उनकी   मृत्यु  हो  गयी ।   मुंशी   प्रेमचंद  उन  रचनाकारों  में  रहे  हैं  । जिन्हें  फिल्मकारों ने  भी  खासा  पसंद  किया  और  उनके  लिखे   किरदारों  को  रुपहले   परदे  भी  जिंदा किया । बीसवीं  शताब्दी   के  सर्वश्रेष्ठ   निर्देशकों  में  से  एक   रहे  ‘ सत्यजीत  रे ‘ ने  भी  प्रेमचंद   की  लिखी  कहानी  ” शतरंज  के  खिलाड़ी ”  की  कहानी   को  अपनी  पहली  हिंदी   फ़िल्म  बनाने  के  लिए  वरीयता दी  । ये  प्रेमचंद  जी  की  कलम  का  जादू  ही  था  जिसने  एक  गैर  हिंदी  भाषी  को  भी  अपनी  ओर  आकर्षित  कर  लिया ।


लगभग  300  कहानियां  कुछ  पूरे – अधूरे  15 उपन्यास  और  कुछ  नाटकों  द्वारा  अपनी  अनमोल  साहित्यिक  विरासत   को  वे  अनेक  साहित्य  प्रेमियों   के  लिए  छोड़  कर  ‘ प्रेमचंद ‘ 8 अक्टूबर  1936  को   हमें  अलविदा  कह  गए  । 


दोस्तों …

उपरोक्त  जो  भी  जानकारी  और   बातें मुंशी  प्रेमचंद  जी  के  विषय  में  लिखी  गयी  है   वे   विभिन्न  स्रोतों  द्वारा  एकत्र  की  गई  है  जैसे  –  अखबार  ,  पत्रिकायें , इंटरनेट आदि  । अगर   किसी  सहित्य प्रेमी   को  ये  जानकारी  त्रुटिपूर्ण  लगती  हो  कृपया  बताएं  ताकि   उसमें  सुधार  हो  सके ।

और  अंत  में  … हमेशा  की  तरह  इस  बार  भी  सुझाव  और  शिकायतों का इंतज़ार रहेगा  । 

धन्यवाद 

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