आत्मसम्मान | SELF ESTEEM

आत्मसम्मान | SELF ESTEEM

सम्मानसम्मान

“ सबसे पहले खुद का सम्मान करना सीखें ”- पाइथागोरस ” Rispect yourself above all ” – Pythagoras


एक कौवा रोज एक पेड़ की डाल पर बैठा रहता था । और रोज एक बाज को शिकार पकड़ते हुए देखता था , बाज अपने शरीर के हिसाब से कला बाजियां खाते हुए अपने शिकार को पकड़ता ,  कौवा उसे देखते हुए ईर्ष्या करने लगता है । और उसके सामने हवा में कलाबाजियां खाने के असफल प्रयास करता और यह दिखाने की कोशिश करता है कि वह भी बाज से कम नहीं है । एक दिन वह पेड़ पर बैठा खाने की तलाश कर रहा था । तभी उसने देखा वही विशालकाय बाज उड़ते हुए आया और जमीन में घूमते हुए एक खरगोश को अपने मजबूत पंजों में दबोच कर पहाड़ी पर ले गया । कौवा जो काफी भूखा था , उसने सोचा आज अच्छा मौका है ऐसे ही शिकार करके मैं भी बाज की तरह स्वादिष्ट भोजन प्राप्त करके दिखा दूंगा । और वह चल पड़ा शिकार की तलाश में । अचानक उसने देखा कि दो खरगोश अपने बिलों से बाहर निकल रहे हैं , कौवा उन पर झपटने  के   लिए  उड़ा । एक  खरगोश  तो  तुरंत  ही  अपने  बिल  में  घुस  गया  परंतु  दूसरे  को  कौवे  ने अपने पंजों में दबोच लिया ।   कौवा उसे लेकर उड़ी रहा था कि खरगोश उसके पंजों से छूट गया । कौवे ने फिर प्रयास किया और खरगोश को दबोच लिया । लेकिन कौवे को खरगोश का  वज़न संभालना मुश्किल हो रहा था । वह थोड़ी देर तो उड़ता लेकिन फिर खरगोश को छोड़ देता । वहीं  थोड़ी  दूरी  पर एक शिकारी ने खरगोशों को पकड़ने के लिए जाल बिछा रखा था । और बहुत दूर खड़ा होकर काफी देर से यह तमाशा देख कर मुस्कुरा रहा था । इस बार जैसे ही खरगोश कौवे के पंजों से छूटा तो वह तेजी से भागता हुआ शिकारी के बिछाए जाल के दायरे में आ गया , और फंस गया । कौवा भी खरगोश को दबोचने के चक्कर में जाल में उलझ गया । खरगोश और कौवा छूटने के लिए जितना संघर्ष करते उतनी ही ज्यादा उलझ जाते । इतने में शिकारी दौड़ते हुए आया और दोनों को पकड़ कर अपना जाल समेट कर घर की तरफ चल पड़ा । घर पहुंच कर उसने उन दोनों को अपनी पत्नी को सौंप दिया । उसकी पत्नी ने पूछा कि खरगोश तो समझ में आता है लेकिन यह कौवा , यह तुम्हारे जाल में कैसे फंस गया   । शिकारी ने हंसते हुए कहा यह कौवा अपना सम्मान न कर खुद को बाज समझ रहा था , लेकिन अब इसे समझ आ गया होगा की असल में यह एक कौवा है और खरगोश को उठाकर हवा में उड़ना इसकी क्षमता से बाहर की बात है ।

दोस्तों… 

चुनौतियां स्वीकार करना अच्छी बात है । यह आपके व्यक्तित्व को निखारती हैं । लेकिन अपनी क्षमताओं और सीमाओं का ज्ञान होना और उन्हें स्वीकार करना बेहद जरूरी है । यह कतई आवश्यक नहीं कि जो चीज हमें आसान दिख रही हो वह सच में ही आसान हो । हो सकता है आगे चलकर उसकी अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़े । कई बार हम अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए , दूसरों के सामने दिखावा करने के लिए  या अति आत्मविश्वास में ऐसी गलती कर बैठते हैं जिसकी भरपाई नहीं हो पाती या बड़ी मुश्किल से होती है ।

आत्म सम्मान किसे कहते हैं ??

हम खुद के बारे में क्या सोचते हैं , इसे ही आत्म सम्मान कहते हैं , हमारा आत्म सम्मान उसी वक्त से निम्नतम स्तर पर आ जाता है जब हम

◆  किसी से ईर्ष्या करने लगते हैं । ( ईश्वर ने सबको किसी न किसी प्रतिभा से सजाया है ईर्ष्या करने का अर्थ है कि आप स्वयं का सम्मान न करके किसी दूसरे से अपनी तुलना कर रहे हैं और खुद को अस्वीकार कर रहे हैं । तुलना आपके मानसिक विकास के रास्ते में पत्थर का काम करती है )

◆ लोगों का ध्यान आकर्षित करने का व्यवहार दिखाते हैं ।

◆ दिशाहीन या लक्ष्य हीन जीवन जीते हैं ।

◆ दूसरों से जबरन  स्वीकृति पाने का प्रयास करते हैं । कमजोर व्यक्ति का शोषण करते हैं और ताकतवर व्यक्ति की चाटुकारिता करते हैं ।

◆ घमंडी स्वभाव के होते हैं ।

◆ दूसरों को नीचा और खुद को बेहतर दिखाने   की कोशिश करते हैं ।


दोस्तों…वास्तविकता में आपको , मुझे या किसी को भी दिखावा करने , मुखौटा लगाने या नकाब पहनने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ….

● अपने से कमजोर व्यक्ति और छोटों के साथ हम क्या व्यवहार करते हैं ।

● हमारी पसंद , नापसंद क्या है ।

● हमारी संगति कैसी है ।

● हम कहां समर्पण करते हैं तथा कहां अडिग रहते हैं ।


यह कुछ ऐसे तथ्य हैं जो आपको सुनने , देखने वालों के अवचेतन को यह सूचना दे देते हैं । कि आपका वास्तविक चरित्र कैसा है  ?? और फिर वे भी आपके साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा संदेश उनका अवचेतन उन्हें देता है ।
अतः .. अपने आत्मसम्मान को विकसित करने की जिम्मेदारी उठाएं ।

कैसे ??

आइए जानते हैं ….

आत्मसम्मान को कैसे विकसित करें ??

लक्ष्य – एक वास्तविक लक्ष्य बनाएं और दृढ़निश्चय के साथ उसे प्राप्त करने के लिए जी जान से जुट जाएं जब आपके पास लक्ष्य होता है तो आप पूर्णता अनुभव करते हैं और आत्मसम्मान में वृद्धि भी ।

संगति – अगर आप चरित्रहीन या गलत विचारों वाले व्यक्तियों की संगति में आरामदायक महसूस करते हैं तो देर – सवेर उनके जैसा बनने के लिए भी तैयार रहिए और अगर आप चाहते हैं कि आपके स्वाभिमान का स्तर ऊपर उठे और आपका दृष्टिकोण एवं चरित्र अच्छा और सकारात्मक बने तो अच्छे लोगों की संगत में रहे यह आपको एक बेहतर इंसान बनने में मदद करेंगे ।

अनुशासन – अगर आप अनुशासन को बंधन समझते हैं तो आप अपने भीतर छिपी प्रतिभा का गला घोट रहे हैं । अनुशासन एक प्रकार की आजादी है , जो आपको भाग्यवादी नजरिए से ऊपर उठाती है । सैकड़ों प्रतिभावान लोग आत्म अनुशासन के अभाव में असफल हो जाते हैं और इसके लिए किस्मत भगवान और चांद – तारों को दोष देते हैं । वह यह बात नहीं समझ पाते कि अगर वह अपने लिए नियम नहीं बनाएंगे तो उन्हें दूसरों के बनाए नियमों पर चलना पड़ेगा । अतः आत्म – अनुशासन का अभ्यास करें और उसे अपने जीवन में लागू करें ।

विष को अमृत में बदलने की कला – जिस तरह हर व्यक्ति में कोई ना कोई गुण होता है उसी तरह हर व्यक्ति में बुराई भी हो सकती है लेकिन वास्तविक विजेता वही व्यक्ति होता है जो अपनी कमियों को ताक़त में बदल देता है जैसे…

अब्राहम लिंकन – बचपन में हक लाते थे लेकिन उन्होंने पेड़ों के साथ भाषण का अभ्यास किया और बाद में एक अच्छे वक्ता बने ।

अमिताभ बच्चन – शुरुआत में उनकी आवाज के कारण उन्हें काम नहीं मिल पा रहा था लेकिन बाद में यही आवाज थी जो दर्शकों में जोश भर देती थी ।

ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जिन्होंने नियति के आगे घुटने नहीं टेके और अपनी कमजोरी को ही अपनी ताकत बनाया ।
प्रत्येक दिन बल्कि प्रत्येक क्षण सच्चाई को स्वीकार करके अपने आत्म सम्मान को विकसित करें । यह आपको समाज में एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में पहचान दिलाता है ।  इसके विपरीत जब वह बनने का ढोंग करते हैं जो आप नहीं है तो आप उस कौवे की भांति व्यवहार करते हैं । जो कहानी के अंत में न कौवा ही रहता है और ना बाज ही बन पाता है ।


उम्मीद है यह पोस्ट आपको पसंद आएगी आप की शिकायतें और सुझाव सादर आमंत्रित हैं ।

Written by
admin
Join the discussion

Share via
Copy link